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भोजपुर परिवहन कार्यालय में 69 लाख के गबन का सनसनीखेज मामला, निशाने पर सिर्फ डाटा ऑपरेटर

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भोजपुर जिला परिवहन कार्यालय में करप्शन का ऐसा मामला सामने आया है, जिसने पूरी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। टैक्स वसूली के नाम पर करीब 69 लाख 11 हजार 698 रुपये सरकारी खजाने में जमा ही नहीं हुए और आरोप केवल एक अनुबंधित डाटा एंट्री ऑपरेटर पर डाल दिया गया। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इतना बड़ा वित्तीय खेल अकेले एक कर्मचारी के बूते संभव है?
मामले का खुलासा तब हुआ जब जिला परिवहन पदाधिकारी (डीटीओ) ने 13 जनवरी 2026 को नवादा थाने में प्राथमिकी दर्ज कराने का आवेदन दिया। पत्र में कहा गया कि तत्कालीन डाटा एंट्री ऑपरेटर अजय कुमार सिंह ने आरटीपीएस काउंटर से नकद रूप में वसूली गई टैक्स राशि सरकारी खजाने में जमा नहीं की। विभागीय जांच में यह गड़बड़ी सामने आई, जिसके बाद कार्रवाई की अनुशंसा की गई।

दो बार नोटिस, फिर भी नहीं दिया जवाब

डीटीओ कार्यालय की ओर से आरोपी कर्मचारी को 9 दिसंबर 2025 और 2 जनवरी 2026 को लिखित पत्र भेजकर स्पष्टीकरण मांगा गया था। चेतावनी दी गई थी कि जवाब नहीं मिलने पर इसे गबन माना जाएगा। लेकिन दोनों बार पत्र का कोई उत्तर नहीं दिया गया, जिसके बाद विभाग ने सीधे आपराधिक मामला दर्ज कराने का फैसला लिया।
पुलिस ने इस शिकायत के आधार पर कांड संख्या 43/26 दर्ज करते हुए आरोपी के खिलाफ बीएनएस की धारा 316(4) और 318(4) के तहत मुकदमा कायम किया है। अब पूरे प्रकरण की जांच शुरू कर दी गई है।

व्यवस्था पर उठ रहे गंभीर सवाल

यह मामला जितना सीधा दिख रहा है, उतना है नहीं। टैक्स वसूली की पूरी जिम्मेदारी जिला परिवहन पदाधिकारी की निगरानी में होती है। प्रतिदिन वसूली गई राशि नाजिर के माध्यम से सरकारी कोष में जमा कराई जाती है। ऐसे में प्रश्न उठता है—
क्या डाटा ऑपरेटर कई महीनों तक अकेले रकम दबाए बैठा रहा?
क्या नाजिर और डीटीओ कार्यालय को इसकी भनक तक नहीं लगी?
रोजाना मिलान और बैंक चालान की प्रक्रिया क्यों नहीं अपनाई गई?
विशेषज्ञों का मानना है कि बिना उच्चस्तरीय मिलीभगत के इतनी बड़ी रकम का गबन संभव नहीं है। केवल एक अनुबंधित कर्मचारी पर दोष मढ़ देना पूरे सिस्टम को बचाने की कोशिश भी हो सकती है।

सितंबर 2024 में मिली थी जिम्मेदारी

जानकारी के अनुसार, भोजपुर परिवहन कार्यालय ने 3 सितंबर 2024 को आरोपी डाटा ऑपरेटर को टैक्स वसूली का प्रभार सौंपा था। कुछ ही महीनों में इतनी बड़ी अनियमितता सामने आ गई, लेकिन निगरानी तंत्र पूरी तरह फेल साबित हुआ। इस बीच पूर्व डीटीओ का तबादला हो गया और नए अधिकारी के आने के बाद मामला उजागर हुआ।स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों ने पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। उनका कहना है कि जब तक डीटीओ, नाजिर और अन्य जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की जांच नहीं होगी, तब तक सच्चाई सामने नहीं आएगी।
अब देखना होगा कि पुलिस जांच सिर्फ एक कर्मचारी तक सिमटती है या परिवहन विभाग के भीतर छिपे बड़े नेटवर्क का भी पर्दाफाश होता है।

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